कार्य

अंतिम नवीनीकृत: 25-Jan-2014

आयोग के कार्य (विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 86)

विद्युत अधिनियम 2003 के अनुसार, आयोग के मुख्य कार्य निम्न प्रकार है

(1) राज्य आयोग निम्निलिखित कृत्यों का निर्वहन करेगा, अर्थात-

  1. राज्य के भीतर विद्युत के थोक, अधिक मात्रा में या फुटकर, यथास्थिति, उत्पादन, आपूर्ति, पारेषण और चक्रण के लिए शुल्क दर अवधारित करना :
  2. परन्तु, जहाँ धारा 42 के अधीन उपभोक्ताओं के सन्दर्भ को खुली पहुँच की अनुमति दी गयी है, वहाँ राज्य आयोग उपभोक्ताओं के उक्त संवर्ग के लिए उस पर केवल चक्रण प्रभार और अधीभार, यदि कोई हो, को अवधारित करेगा।

  3. विद्युत क्रय और वितरण लाईसैंस धारी के उपाप्त प्रक्रिया को विनियमित करना जिसमें वह कीमत शामिल होगी, जिस पर विद्युत को उत्पादन करने वाली कम्पनी या लाईसैंस धारी से या राज्य के भीतर वितरण और आपूर्ति के लिए विद्युत के क्रय के लिए करार के माध्यम से अन्य स्त्रोत को उपाप्त करेगा
  4. विद्युत के अन्तः राज्यिक पारेषण और चक्रण को सुकर बनाना
  5. पारेषण लाईसैंस धारीयों, वितरण लाईसैंस धारीयों और विद्युत व्यापारियों के रूप में राज्य के भीतर उनके प्रवर्तन के सम्बन्ध में कार्य करने की ईप्सा करने वाले व्यक्तियों को लाईसैंस जारी करना
  6. किसी व्यक्ति को ग्रिड और विद्युत के विक्रय से संयोजित करने के लिए उपयुक्त उपाय का प्रावधान करने के लिए विद्युत के नवीकरणीय स्त्रोत से विधुत के सह-उत्पादन और उत्पादन को समुन्नत करना और ऐसे स्त्रोतों से विद्युत के क्रय के लिए वितरण लाईसैंस धारी के क्षेत्र में विद्युत के पूर्ण उपभोग के प्रतिशत के लिए भी विनिर्दिष्ट करना
  7. लाईसैंस धारीयों और उत्पादन करने वाली कम्पनियों के बीच विवादों का न्यायनिर्णयन करना और माध्यस्थम् के लिए किसी विवाद को निर्दिष्ट करना
  8. इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए फीस का उद्ग्रहण करना
  9. राज्य ग्रिड संकेत को विनिर्दिष्ट करना, जो धारा 79 की उपधारा (1) के खण्ड (ज) के अधीन विनिर्दिष्ट ग्रिड संकेत से संगत हो
  10. लाईसैंस धारीयों द्वारा सेवा की गुणवत्ता, निरन्तरता और विश्वसनीयता के सम्बन्ध में मानक को विनिर्दिष्ट करना या प्रवर्तित करना
  11. विद्युत के अन्तः राज्यिक व्यापार में व्यापार लाभ को नियत करना, यदि आवश्यक समझा जाए और
  12. ऐसे अन्य कार्यों का निवर्हन करना, जो इस अधिनियम के अधीन उसको समनुदेशित किया जाए।

(2) राज्य आयोग निम्नलिखित मामलों में से सभी या किसी पर राज्य सरकार की सलाह लेगा, अर्थात्-

  1. विद्युत उद्योग के क्रियाकलाप में प्रतियोगिता, दक्षता और अर्थ व्यवस्था की वृद्धि,
  2. विद्युत उद्योग में विनियोग की वृद्धि,
  3. राज्य में विद्युत उद्योग का पुनर्गठन और पुनः संरचना,>
  4. विद्युत के उत्पादन, पारेषण, वितरण और व्यापार से सम्बन्धित मामलों या उस सरकार द्वारा राज्य आयोग को निर्दिष्ट कोई अन्य मामला।

उपरोक्त के अलावा, हरियाणा विद्युत सुधार अधिनियम, 1997 के तहत वे कार्य जो कि विद्युत अधिनियम 2003 के साथ असंगत नहीं हैं, निम्नलिखित हैं:

  1. लाइसैंस धारियों के कार्यों को विनियमित करना और एक कुशल, किफायती और न्यायसंगत तरीके से उनके कार्यों को बढ़ावा देना ;
  2. राज्य में बिजली के उपयोग में दक्षता, किफायत, और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए तथा विषेशकर गुणवत्ता और सेवा की निरंतरता, विश्वसनीयता और बिजली सम्बन्धित उचित मांगों को पूरा करने को सक्षम करने के संबंध में ;
  3. उपभोक्त्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए बिजली की खरीद, आपूर्ति, वितरण, उपयोग, सेवा की गुणवत्ता, टैरिफ और शुल्क देय को विनियमित करते हुए इस पर भी विचार करना कि पर्याप्त प्रभारों को लगाये एवं विधिवत वसूले बिना बिजली की पर्याप्त आपूर्ति और वितरण नहीं की जा सकती ;
  4. प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए और उत्तरोत्तर निजी क्षेत्र की भागीदारी शामिल करने के लिए, तथा साथ ही ग्राहकों के साथ निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए ;
  5. बिजली की मांग और उपयोग का पूर्वानुमान के लिये आंकड़े इकट्ठा करने तथा बिजली के लाइसैंस धारियों से इस तरह के आंकड़े इकट्ठा करने और पूर्वानुमान की आकांक्षा करना;
  6. लाइसैंस धारियों को अन्य पणधारियों के साथ तालमेल करके बिजली के उत्पादन, पारेषण, वितरण, और बिजली की आपूर्ति को बढ़ावा देने के लिए परिप्रेक्ष्य योजनाएँ व स्कीमें तैयार करने की आकांक्षा करना;
  7. राज्य में विद्युत उद्योग के लिए आचरण और मानकों की उपयुक्त संहिता स्थापित करना;
  8. राज्य में विद्युत उद्योग से परिसंपत्ति, संपत्तियों तथा संपत्तियों मे दिलचस्पी को नियमित करना; तथा
  9. सभी आनुषंगिक अथवा अनुषंगी कार्य करना।